कोटा के वीर मेहराब ख़ां 1857 के संग्राम का मिटा दिया गया नायक
Special Story Kota Rajasthan by MHR DIGITAL Media House Rajasthan
न्यूज़ स्टोरी/रविशंकर सांवरिया/मीडिया हाउस/कोटा।
1857 का प्रथम स्वतंत्रता संग्राम जब पूरे देश में अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ ज्वालामुखी की तरह फूटा, तब राजस्थान का कोटा भी इससे अछूता नहीं रहा। यह वह समय था जब कोटा की धरती ने ऐसे साहसी पुरुष को जन्म दिया, जिसने न सिर्फ अन्याय के सामने सिर उठाया, बल्कि अंग्रेजी हुकूमत के अत्याचारों के खिलाफ खुला युद्ध छेड़ दिया। उनका नाम था – मेहराब ख़ान, कोटा राज्य सेना में रिसालदार और लाला जयदयाल के घनिष्ठ साथी।
मेहराब खान का जन्म 11 मई 1815 को करौली में हुआ था। जीवन की सादगी, ईमानदारी और न्यायप्रियता ने उन्हें सैनिक जीवन में नेतृत्व के योग्य बनाया। वे घुड़सवारी, युद्धकला और शस्त्र संचालन में दक्ष थे। जब अंग्रेजों ने कोटा रियासत पर अपना दबदबा बढ़ाना शुरू किया, तब मेहराब खान के भीतर ज्वाला जलने लगी कि यह देश गुलामी स्वीकार नहीं करेगा। उनके भीतर सिपाही नहीं, एक क्रांतिकारी जन्म ले चुका था। 1857 के विद्रोह की आग जब कोटा पहुंची, तब यहां के लोगों को एक ऐसे मार्गदर्शक की आवश्यकता थी जो विद्रोह को दिशा दे सके। यही वह क्षण था जब लाला जयदयाल और मेहराब खान एक साथ खड़े हुए। दोनों ने मिलकर कोटा की सैनिक टुकड़ियों को संगठित किया और अंग्रेजी एजेंसी हाउस पर हमला बोल दिया।
इस हमले ने अंग्रेजों के होश उड़ा दिए। कोटा कुछ समय के लिए अंग्रेज़ी शासन से मुक्त घोषित हुआ। यह वह दौर था जब मेहराब खान की वीरता हर गली-कूचे में गूंज रही थी। वे रणनीति बनाते, युद्ध का नेतृत्व करते और सैनिकों का हौसला बढ़ाते। उनके शब्दों में आग थी और आदेशों में बिजली। लेकिन स्वतंत्रता के इस प्रयास की कीमत बहुत भारी थी। अंग्रेजों ने पूरे साम्राज्य की शक्ति लगाकर कोटा में विद्रोह को दबाने की तैयारी की। विश्वासघात हुआ, सैनिक बिखर गए और कई क्रांतिकारी गिरफ्तार कर लिए गए। मेहराब खान और लाला जयदयाल भी पकड़े गए। उनके खिलाफ अंग्रेजी अदालत में औपचारिक मुकदमा नहीं चला, बल्कि उन्हें “उदाहरण” बनाने के लिए त्वरित फांसी की सज़ा सुना दी गई।
17 सितंबर 1860 को कोटा की धरती पर वह काला दिन आया जब इस बहादुर योद्धा को फांसी पर चढ़ा दिया गया। परंतु मरते-मरते भी वे अंग्रेजों की आंखों में आंखें डालकर बोले – भारत आज नहीं तो कल जरूर आज़ाद होगा।” उनका अस्तित्व शायद अंग्रेजी इतिहास ने मिटाने की कोशिश की हो, लेकिन कोटा की जनता आज भी मेहराब खान को साहस, बलिदान और नेतृत्व की प्रतिमूर्ति मानती है।
वे सिर्फ एक सैनिक नहीं थे, बल्कि वे ऐसी आत्मा थे जिसने गुलामी के अंधेरे में पहली बार स्वतंत्रता की चिनगारी प्रज्वलित की। उनका संघर्ष इस बात का प्रमाण है कि इतिहास हमेशा उन लोगों को याद रखता है जो अन्याय के सामने झुकते नहीं, बल्कि खड़े होकर लड़ते हैं।
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