हल्दीघाटी का पठान वीर: सेनापति हाकिम खां सूरी की अमर गाथा
Hakim Kha True Life Story By MHR NEWS Media House Rajasthan
रिपोर्ट एजेंसी/मीडिया हाउस राजस्थान।
राजस्थान की वीर भूमि सदैव आन-बान-शान, स्वाभिमान और बलिदान की प्रतीक रही है। इसी धरती पर महाराणा प्रताप जैसे महायोद्धा ने स्वतंत्रता के लिए संघर्ष किया और उनके साथ कंधे से कंधा मिलाकर जिन वीरों ने इतिहास रचा, उनमें सेनापति हाकिम खां सूरी का नाम अत्यंत सम्मान के साथ लिया जाता है। हल्दीघाटी का युद्ध केवल मेवाड़ और मुगल साम्राज्य के बीच हुआ सैन्य संघर्ष नहीं था, बल्कि यह आत्मसम्मान और स्वतंत्रता की वह निर्णायक लड़ाई थी, जिसमें धर्म, जाति और मजहब की सीमाएं टूट गईं। अफगान मूल के पठान सेनापति हाकिम खां सूरी ने महाराणा प्रताप के प्रति जो अटूट वफादारी दिखाई, वह भारतीय इतिहास में अद्वितीय उदाहरण मानी जाती है। हल्दीघाटी के युद्ध में हाकिम खां सूरी को महाराणा प्रताप की सेना के हरावल दस्ते का नेतृत्व सौंपा गया था।
युद्ध प्रारंभ होते ही उन्होंने अपनी अद्भुत रणकौशल और अपार साहस से बादशाही फौज के हरावल दस्ते पर ऐसा प्रहार किया कि मुगल सेना की अग्रिम पंक्ति तितर-बितर हो गई। उनकी तलवार की धार और युद्धनीति ने शत्रु सेना को भारी क्षति पहुंचाई और कुछ समय के लिए मुगल सैन्य व्यवस्था पूरी तरह डगमगा गई। युद्ध के दौरान वे वीरगति को प्राप्त हुए, किंतु उनकी बहादुरी की कथाएं आज भी लोककथाओं और इतिहास में जीवित हैं। कहा जाता है कि उनका घोड़ा उनका धड़ लेकर युद्धभूमि से लगभग तीन किलोमीटर दूर स्थित रक्त तलाई तक पहुंचा, जबकि उनका कटा हुआ सिर वहीं गिरा, जहां आज उनकी मजार स्थित है।
लोकमान्यताओं के अनुसार, युद्ध के बाद महाराणा प्रताप को जब यह ज्ञात हुआ कि हाकिम खां सूरी की तलवार उनके हाथ से अलग नहीं हो सकी है, तब उन्होंने आदेश दिया कि उस वीर को तलवार समेत ही दफनाया जाए। यह निर्णय केवल सम्मान का प्रतीक नहीं था, बल्कि उस योद्धा की अदम्य वीरता और जीवनभर की निष्ठा को सलाम था। इसी प्रसंग को स्मरण करते हुए कहा जाता है—“हल्दीघाटी का पठान वीर, न लगाम छूटी न शमशीर।” यह पंक्ति उस रणबांकुरे की दृढ़ता और अंत तक युद्धरत रहने की भावना को अमर कर देती है।
हाकिम खां सूरी का बलिदान यह स्पष्ट करता है कि भारत की स्वतंत्रता और स्वाभिमान की रक्षा के लिए लड़ी गई लड़ाई किसी एक समुदाय की नहीं थी। उन्होंने यह सिद्ध किया कि सच्ची वफादारी जन्म या मजहब से नहीं, बल्कि कर्म, संकल्प और मूल्यबोध से जन्म लेती है। आज भी रक्त तलाई और सेनापति हाकिम खां सूरी की मजार उस ऐतिहासिक गाथा की सजीव साक्षी हैं, जो हमें यह संदेश देती है कि मातृभूमि, सम्मान और स्वतंत्रता के लिए दिया गया बलिदान युगों-युगों तक प्रेरणा देता रहेगा।
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