कोटिया भील कोटा का प्राचीन जनक और वीरता की अनसुनी धरोहर
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स्टोरी रिपोर्ट/रवि शंकर सामरिया/मीडिया हाउस राजस्थान।
कोटा के इतिहास का जब भी जिक्र होता है, वहां की वीर भूमि कई अनसुने नामों के साथ सामने आती है। उन्हीं नामों में एक सबसे प्रमुख और लोकमान्य वीर हैं कोटिया भील। लोक कथा, जनश्रुति और इतिहास के मिश्रित स्वरूप में यह नाम सदियों से कोटा की मिट्टी में जीवित है। कोटिया भील को चंबल नदी के दाहिनी ओर स्थित अकेलगढ़ किले का भील शासक माना गया है। यह वह काल था जब कोटा नाम से कोई बड़ा नगर नहीं था, बल्कि यह क्षेत्र भीलों और आदिवासी सरदारों के प्रभाव के अंतर्गत था। कहते हैं कि कोटिया भील अपनी वीरता, निर्णय क्षमता और युद्ध कौशल के लिए इतने प्रसिद्ध थे कि आसपास के राजपूत राज्य भी उनका नाम सुनकर सावधान हो जाते थे। उनका शासन न्यायप्रिय और जनता के प्रति समर्पित माना गया है। वे अपने समुदाय की रक्षा, भूमि की सुरक्षा और बाहरी शक्तियों के विरुद्ध रणनीतिक रूप से लड़ने के लिए सदैव तत्पर रहते थे।
कोटिया भील के समय को लगभग 12वीं से 13वीं सदी का माना जाता है। यह वह दौर था जब बूंदी और आसपास के हाड़ा राजपूत राज्यों का विस्तार चल रहा था। स्थानीय कथाओं के अनुसार कोटिया भील का अकेलगढ़ किला चंबल क्षेत्र में उनकी शक्ति का केंद्र था। कहा जाता है कि एक समय बूंदी के हाड़ा राजा ने कोटिया भील को शांति और मित्रता का प्रस्ताव भेजा और उन्हें भोज के लिए आमंत्रित किया। लेकिन यह आमंत्रण छल से भरा हुआ था। जब कोटिया भील वहां पहुंचे, उन्हें नशे की हालत में या असावधान अवस्था में हमला कर घेर लिया गया।
किंवदंतियों में यह भी कहा जाता है कि कोटिया भील ने अपने अंतिम क्षणों तक अकेले ही भीषण युद्ध किया। यहां तक कि एक लोककथा में उल्लेख है कि उनका सिर कट जाने के बाद भी उनका वीर धड़ कुछ क्षण लड़ता रहा। यह कथा सत्य हो या प्रतीकात्मक, पर यह दिखाती है कि जनता में उनकी वीरता की स्मृति कितनी प्रभावशाली थी।
स्थानीय लोक श्रुतियों में यह भी कहा जाता रहा है कि कोटा शहर का नाम “कोटिया” के नाम से ही विकसित हुआ। अनेक बुजुर्ग जन इस बात को दृढ़ भाव से बताते हैं कि इस क्षेत्र का नाम उन्हीं बहादुर भील सरदार के नाम पर पड़ा था। हालांकि इसका ऐतिहासिक पक्ष विद्वानों में विवादित है। कुछ इतिहासकार मानते हैं कि कोटा नाम किसी किले (कोट) या प्रशासनिक इकाई से आया, जबकि बड़ी संख्या में स्थानीय परंपराएं कोटिया भील को ही इस क्षेत्र की आरंभिक पहचान मानती हैं। बाद के समय में जब हाड़ा राजपूतों ने यहां शासन स्थापित किया, तब कोटिया भील का प्रभाव कम हुआ, पर उनकी कहानी जनता के दिलों में हमेशा जीवित रही।
कोटिया भील केवल एक योद्धा नहीं थे, बल्कि वे उस क्षेत्र की सांस्कृतिक आत्मा के प्रतिनिधि भी थे। वे प्रकृति-आधारित जीवन, स्वतंत्रता और अधिकार के प्रतीक माने जाते हैं। भील समुदाय उन्हें एक आदर्श और पुरखों की परंपरा के संरक्षक के रूप में देखता है। कई लोकगीतों में आज भी उनका नाम गाया जाता है, जिनमें उनकी बहादुरी और अंतिम संघर्ष का वर्णन मिलता है।
कोटा शहर की सांस्कृतिक स्मृति में वे आज भी आदर और गर्व के पात्र हैं। हाल के वर्षों में उनकी जयंती समारोह और सांस्कृतिक कार्यक्रमों ने उनके सम्मान को नई पहचान दी है। कोटिया भील का इतिहास लिखित रूप में बहुत कम उपलब्ध है, क्योंकि उस समय का अधिकांश इतिहास लोककथाओं, मौखिक परंपराओं और समुदाय की स्मृति पर आधारित है। परंतु यह निर्विवाद है कि उन्होंने इस क्षेत्र के निर्माण, सुरक्षा और सम्मान में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उनके संघर्ष, त्याग और न्यायप्रियता ने कोटा के इतिहास को एक विशिष्ट पहचान दी है। इतिहास चाहे जितना बदल दिया जाए, पर लोकमानस में जीवित नाम कभी नहीं मिटते। कोटिया भील ऐसा ही एक नाम जो वीरता, स्वाभिमान और आदिवासी गौरव का अमर प्रतीक हैं।
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