Kota: निर्मल होकर भक्तिपथ पर निरंतर आगे बढ़ना चाहिए: आचार्य ऋतुराज
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कोटा, 19 जुलाई। दादाबाड़ी गौतम वाटिका में चल रही श्रीमद भागवत कथा के चतुर्थ दिवस पर कथाव्यास आचार्य श्री ऋतुराज ने प्रहलाद भक्ति चरित्र की कथा सुनाई। उन्होंने कहा कि भक्ति मार्ग पर जब मनुष्य चलता है तो काम, क्रोध, ममता, मद आदि बाधाएं विघ्न डालती हैं। पर साधक मनुष्य भक्ति पथ से विचलित नही होता है। साध्य (परमात्मा ) को प्राप्त करने के लिए जो साधक दृढ़ निश्चयी होकर साधन (भजन) करता है। उसे भगवत प्राप्ति अवश्य होती है। इसलिए मनुष्य को प्रहलाद के समान ही अनेक कष्ट सहन करके भी भगवत पथ नहीं छोड़ना चाहिए। भगवान के भक्तों की महिमा का वर्णन करते हुए कथा व्यास ने बताया कि अम्बरीष भगवान के परम भक्त हैं, लेकिन जब दुर्वासा ऋषि ने अम्बरीश पर क्रोध किया तो भगवान ने अपने सुदर्शन चक्र से भक्त की रक्षा की। जब दुर्वाशा भगवान की शरण गए तब परमात्मा ने कहा कि मैं "भक्तो के अधीन हूं" जो मेरी भक्ति करते हैं, मैं उनके वश में हो जाता हूं।
कथा व्यास ने कहा कि निर्मल होकर भक्तिपथ पर निरंतर आगे बढ़ना चाहिए। जिससे भगवतानुभूति सजह प्राप्त होने लगती है। भगवान राम का चरित्र सुनाते हुए कथा व्यास ने बताया कि राम धर्म का विग्रह है। भगवान राम के चरित्र से हमें मर्यादा की शिक्षा लेना चाहिए। कथा व्यास ने बताया कि राम ने प्रारम्भ ताड़का वध से किया। इसका अभिप्राय यह है कि जहाँ से राक्षसों की उत्त्पति होती है। उसे ही समाप्त किया जाना चाहिए। अर्थात भक्ति पथ में बाधक तत्व अहंकार, लोभ है। प्रारम्भ में इन पर विजय पाना आवश्यक है। तब ही भक्ति पुष्ठ हो सकती है। श्रीकृष्ण जन्मोत्सव पर आचार्य श्री ऋतुराज ने कहा कि भारत भूमि पर जब जब भी आनाचार और पापाचार बढ़ा है। तब तब किसी न किसी रूप में परमात्मा ने आकर धर्म की स्थापना की है।
इस अवसर पर भगवान कृष्ण की सुंदर झांकी सजाई गई तथा नंदोत्सव में सभी भक्तों ने भाव विभोर होकर बधाई का आनद लिया। उसके बाद आरती हुई। जिसमें मुकुट बिहारी शर्मा, अक्षय शर्मा, जगमोहन शर्मा, कुंजबिहारी गौतम, मनोज गर्ग ने भाग लिया। पश्चात प्रसाद वितरण किया गया।
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